क्या लाऐ...चुप क्योँ हो,
कुछ तो कह दो?
मेरे हाथ हैं मिट्टी से सने,
आसमाँ लाऐ तुम,
उधर जमीं पर रख दो!
इस मेहरबानी का कर्ज किसी
सूरत में चुका सकूँगा नहीं,
वेवजह है ये फिर बुरा ना मानना
अमीर नहीं इतना, न कहना
कभी की अब हक दो!
फिर भी कहता हूँ, असमां लाऐ हो
जो मेरे लिए, इसे जमीं पर रख दो!!
अभिजीत ठाकुर
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