पाँव हौले से रख
कश्ती से उतरने वाले
ज़मीं अक्सर किनारों से
ही खिसका करती हैँ।
थोड़ी तल्खी है जरूरी
अपनों से, गैरों से कभी
रिश्ते नहीं दरका करते हैं।
जोर लगाना ही पड़ेगा
हाथों से,पत्थर हवाओँ से
नहीं खिसका करते हैं।
घाव सीने पड़ेगेँ सूई से
जख्म हर बार, मलहम
से नहीं भरा करते है।
महकेगा नहीं जीवन
नादान कभी, फूल कागजोँ
के नहीं महका करते हैँ।
छोड़ दिया होगा
साथ तेरे अपनों ने,
जीवन सफर में यूँ
मायूस नहीं हुआ करते हैं।।
अभिजीत ठाकुर
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