कृतज्ञता- अनमोल गुण
विशाल असीमित अस्तित्व के समक्ष हम कुछ भी नही।हमने अपनी लघुता विस्मृत कर दी, और स्वयं को अति महत्वपूर्ण मान लिया। अहंकार और लालसा में आकंठ डूब गए, फलस्वरूप कृतज्ञता का अति महत्वपूर्ण गुण हम गंवा बैठे। जीवन में इसके भयंकर परिणाम हुए।
हम भूल ही गए की कृतज्ञ कैसे रहें?या इसके क्या शुभ परिणाम हमारे जीवन में हो सकते हैं। मैं बिल्कुल भी व्यवसायिक या औपचारिक व्यवहार में व्यक्त की जाने वाली कृतज्ञता की बात नहीं कर रहा हूँ। प्रायः जीवन
में जो भी औपचारिक है वो झूठ होता चला जाता है।
ये हमारा मूल अस्तित्वगत गुण है। इस गुण को ठीक से पहचानने का कार्य हमारा व्यक्तिगत है।
क्या हम सोते समय, जागते समय या अपनी जीवन चर्या का निर्वहन करते हुए किसी भी समय या किसी भी कार्य को करते हुए कृतज्ञ महसूस कर पाते हैं? ये प्रश्न निरन्तर हमें स्वंय से पूछना होगा।
यदि जीवन में अनावश्यक कलह, असंतोष और व्यर्थ का सन्ताप है तो हमें गीता में वर्णित भगवान श्री कॄष्ण के उस विधि को समझना होगा जिसमें भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को अभ्यास और वैराग्य का महत्व समझा रहे हैं।
प्रिय बन्धुओं! कृतज्ञ रहिये हवा पानी, चांद तारे और उन सभी चीजों के प्रति जो आपकी नहीं है,और भी बहुत कुछ है हमारे आस-पास जिसके प्रति हम हार्दिक कृतज्ञता महसूस कर सकते हैं। सच्चाई तो ये है संपूर्ण जीवन के हर क्षण में कृतज्ञता का अति विशिष्ट स्थान है।
कृतज्ञता का निरन्तर अभ्यास हमें वैराग्य रूपी नौका में विचरण करवाते हुए करुणा की उच्चतम अवस्था तक ले जा सकता है। बस इतना ही नहीं सांसारिक जीवन के अनेक संतापों की रामवाण औषधि "कृतज्ञता" है।
प्रिय मित्रों, आशा है आप कृतज्ञता जैसे अनमोल गुण को अपने जीवन में महत्वपूर्ण स्थान देंगे। इसी गुण के कारण हम कभी न कभी अवश्य कह सकेंगे की - "My purpose of life is fullfilled on this planet"
धन्यवाद:

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